February 26, 2024

सृष्टि होती है. उसके बाद सृष्टि का अंत हो जाता है, प्रलय हो जाती है. प्रलय के बाद पहले की भांति फिर सृष्टि होती है…. फिर प्रलय हो जाती है…. फिर सृष्टि और यह सिलसिला चल ही रहा है. समाप्त नहीं होगा। यह कब प्रारंभ हुआ यह भी कोई नहीं जानता। कब से है? यह तब से है जब से कब से नहीं था अर्थात अनादि और अनंत है.ऐसा मत हिंदू धर्म में मिलता है या यूं कहें कि सनातन धर्म में मिलता है. यह वेदों, पुराणों और दर्शन,सांख्य शास्त्र, पर आधारित है. बाइबिल में ऐसा नहीं है. अभी जो संसार दिखता है वह पहली बार बना है. इसे भगवान ने छः दिनों में बनाया और सातवें दिन विश्राम किया। एक दिन बाइबिल में 2Peter 3/8 के अनुसार मनुष्य के 1000 साल के बराबर होता है. जबकि क़ुरान Quraan 70/4 में एक दिन 50000 साल के बराबर बताया गया है.वैज्ञानिक कार्ल सीगन ने अपनी किताब cosmos कॉसमॉस(1985) पेज 258 पर लिखा है कि केवल हिंदू धर्म ही बताता है कि ब्रह्माण्ड बार-बार पैदा होता है और बार-बार समाप्त हो जाता है ,हिंदुओं की काल गणना को भी ‘बिग बैंग’ के समीप माना है. ब्रह्मा जी का एक दिन और रात मनुष्यों के 8. 64 बिलियन साल बराबर होता है.बाइबल के अनुसार इस संसार की पहली ही बार रचना हुई है और जब यह समाप्त होगा तो हमेशा के लिए समाप्त हो जाएगा। कुरान भी संसार का समाप्त होना बताती है, परंतु समाप्ति के बाद एक नया संसार बनेगा जो सदा रहेगा. दोबारा प्रलय नहीं बताई गई है l

प्रलय को समझने के लिए सृष्टि को समझना आवश्यक है. महाप्रलय(जो कल्प प्रलय से भिन्न है ) के समय कोई हलचल नहीं होती है.सब कुछ बिना हलचल के और शांत होता है.भौतिक शक्ति सोई हुई थी ,केवल भगवान की अन्तरंगा शक्ति ही व्यक्त थी . भगवान ही दृष्टा थे ,कोइ दृश्य नहीं था. भगवान अपने को असत्य समझने लगे. वे असत्य नहीं हैं ,सोई हुईं शक्तियों,जीवो और स्वांशो के कारण ऐसा समझा. सृष्टि के आभाव में वे अपने को अधूरा मान रहे थे। . ऋग्वेद10.129,श्रीमद्भागवत,श्रीमद् भगवतगीता और सांख्यदर्शन के अनुसार भगवान संकल्प करते हैं कि वह अनेक हो जाएं. इस संकल्प से प्रकृति में , जोकि एकदम निश्चल स्थिति में होती है ,भगवान की काल शक्ति से हलचल आरम्भ होती है.भगवान की स्वभाव शक्ति तीनों गुणों को परिवर्तित करती है और कर्म महत्तत्व को जन्म देता है. भगवान के एक से अनेक होने के संकल्प को आदि कर्म कहा है. कर्म की परंपरा का इससे आरंभ हुआ है.इसे विश्राम का त्याग भी बताते हैं…..8/3गीता . इसे कहते हैं कि भगवान ने प्रकृति के गर्भ में बीज स्थापित किया. इस कर्म से ही महतत्व पैदा होता है. महा -प्रलय के पश्चात सृष्टि में सबसे पहला पदार्थ जो प्रकट होता है वह महतत्व है.यह परमपुरुष की परम चेतना से जुड़ा हुआ है , उसकी छाया या प्रतिबिम्ब है ,पर भौतिक पदार्थ सा प्रतीत होता है . रजोगुण के कारण इसमें क्रियाशीलता है . महतत्व से अहम्कार पैदा होता है.अहम्कार –सात्विक,राजसिक व् तामसिक — से मन ,पांच ज्ञानेंद्रियां और पांच कर्म-इन्द्रियाँ प्रकट होती हैं, इसी से पांच तन्मात्राएं और इन पांच तन्मात्राओं से पांच महाभूत— आकाश ,वायु, अग्नि, जल और धरती प्रकट होते हैं. सृष्टि में प्रकृति के अलावा काल,स्वभाव और जीव भी रहते हैं.भागवतानुसार यह सब निष्क्रीय रहते हैं. भगवान अपनी कालशक्ति सहित इनमें प्रवेश करते हैं तो इनमें चेतना आती है. यह विराट पुरुष है ,जो कि आदि अवतार ,प्रथम जीव , समस्त जीवों की आत्मा और परमात्मा का अंश है — 3/6/1-8. इसमें ही समस्त लोक हैं . और अर्जुन को दिखाया गया विराट रूप कृष्ण के छोटे से अंश में स्थित है –गीता 10/ 42. इससे भगवान कृष्ण की विशालता -अनन्ता पर ध्यान जाता है . परमहंसों में प्रधान श्री सांख्यायन जी से गुरु परम्परा से आदिपुराण, जो कल्प प्रलय के पश्चात की रचना समझता है , पारासर जी व वृहस्पति के पास आया फिर पुलस्त्य मुनि की सिफ़ारिश पर मैत्रय जी को मिला–3/8/10-17.इसके अनुसार भगवान नारायण एक सहस्त्र चतुर्युगी के पश्चात जब जागते हैं तब उनकी नाभि से सृष्टि की रचना हेतु एक सूक्ष्म तत्त्व प्रकट होता है जिसमें वे अन्तर्यामी के रूप में प्रवेश करते हैं. उससे ब्रह्माजी प्रकट होते हैं जो आगे संसार की रचना करते हैं (यह ब्रह्माजी के प्रसंग में कुछ विस्तार से बताया गया है). महा प्रलय के समय,कल्प प्रलय से भिन्न , एक भगवान –मूलतत्त्व — के आलावा कुछ भी नहीं होता, नारायण भी नहीं . . सृष्टि की रचना करना,जो भगवान अपनी गुणमयी माया से अपनी अध्यक्षता में करवाते हैं, वास्तव में भगवान की कृपा है. जीव को मानव शरीर देकर अवसर दिया जाता है कि वह भगवत्प्राप्ति/ मोक्ष प्राप्ति कर ले और अनंत आनंद प्राप्त कर लें.पुनः प्रेम करने हेतु नया नीड़/शरीर दिया जाता है–नीड का निर्माण फिर फिर,नेह का आह्वान फिर फिर .

इस संसार को भागवत सनातन वृक्ष बताती है . आश्रय एक है ,प्रकृति . दो फल –सुख दुःख;तीन जड़ें –सत्व ,रज,तम ;चार रस –अर्थ,धर्म,काम,मोक्ष . श्रोत्र ,त्वचा ,नेत्र ,रसना व नासिका से इसे जाना जाता है . पैदा होना ,रहना,बढ़ना,बदलना,घटना और नष्ट होना इसका स्वभाव है. आठ शाखाएं है –मन,बुद्धि ,अहंकार व पांच महाभूत. नौ द्वार हैं ,मुख आदि ;दस प्राण हैं ,उदान ,अपानादि . इसमें ईश्वर व् जीव दो पक्षी रहते हैं . सबका एक मात्र आधार भगवान हैं –प्रलय,उत्तपत्ति,रक्षा–10/2/27-28 .

भागवत ने चार प्रकार की प्रलय बताई है:नैमित्तिक ,प्राकृतिक ,आत्यंतिक और नित्य.

ब्रह्मा जी अपना एक दिन बिताने के बाद शयन करते हैं. यही नैमित्तिक प्रलय है. ब्रहमा जी का एक दिन 1000 चतुर्युगी के बराबर होता है. कलि युग 432000 वर्ष का होता है, इससे दो गुना द्वापर , तीन गुना त्रेता ,चार गुना सतयुग। चारों युग मिलाकर 43 लाख 20 हज़ार वर्ष के होते हैं.ब्रह्मा का दिन 4 अरब 32 करोड़ वर्ष का हुआ.यह एक कल्प कहलाता है. इतनी बड़ी ही उनकी रात होती है जिसमें वह सोते हैं.ब्रह्मा जी की रात्रि हमारे लिए प्रलय है. रात के बाद दिन में पुनः सृष्टि होती है; सृष्टि के बाद पुनः रात होती है अर्थात प्रलय होती है… और यह सिलसिला चलता रहता है. अपने मान से 100 वर्ष पूरे कर के ब्रह्माजी भी समाप्त हो जाते हैं. इसे प्राकृतिक प्रलय या महाप्रलय कहते हैं. ब्रह्माजी के 1 वर्ष में 360 दिन और इतनी ही रातें होती हैं.हर कल्प के बाद नैमित्तिक प्रलय होती है . ब्रह्मा जी के 100वर्ष के पश्चात प्राकृतिक प्रलय होती है. इस प्रलय में सारा संसार अपने कारण में घुल मिल जाता है ,लय हो जाता है.प्राकृत सृष्टि भी नहीं रहती . कल्प प्रलय में चराचर प्राणी समाप्त हो जाते हैं, प्राकृत सृष्टि वैसी -की -वैसी रहती है –2 /10 /46 .कल्प प्रलय में तीनों लोक ब्रह्माजी में छिप जाते हैं . महर्लोक के वासी ताप से पीड़ित होकर जनलोक चले जाते हैं ,जल के भीतर शेषशायी भगवान शयन करते हैं –3/11/27-31. संसार का महा प्रलय/प्राकृत प्रलय संसार की सृष्टि के विपरीत क्रम से होता है. जो सबसे बाद में उत्पन्न होता है वह सबसे पहले समाप्त होता है. अर्थात पंचमहाभूत सबसे पहले समाप्त होते हैं, और महतत्व सब के पश्चात. इस प्रलय में भयंकर उत्तल पुथल होती है. ऐसी उथल-पुथल का वर्णन बाइबिल और कुरान में भी है— 2Peter3/10, Genisis7 , Quraan69/13-16 . प्रलय का समय आने पर 100 वर्षों तक बारिश नहीं होती. खाने के पदार्थ अंन आदि उत्पन्न नहीं होते.प्रजा क्षीण हो कर समाप्त हो जाती है. सारा जल सूर्य सोख लेता है; परंतु वर्षा नहीं होती. सब ओर से ब्रह्मांड जलने लगता है. गोबर के पिंड की तरह जलता हुआ प्रतीत होता है. प्रलयकालीन अग्नि का नाम है सावर्त्तक अग्नि. प्रचंड वायु सैकड़ों वर्षो तक चलती है. फिर भयंकर बारिश आती है.सारा संसार समुद्र ही हो जाता है. धरती तत्व को जल तत्त्व ग्रस लेता है ,जल को तेज,तेज हो वायु, और वायु को आकाश. यह सब अहंकार में समा जाते हैं. और अहंकार महतत्व में. महतत्व को प्रकृति के गुण ग्रस लेते हैं. काल का भी कोई विकार नहीं होता.इस अव्यक्त को जगत का मूलभूत तत्व कहते हैं. इस अवस्था का नाम प्राकृत प्रलय है. प्रकृति और पुरुष की शक्तियां काल के प्रभाव से क्षीण हो जाती हैं और अपने मूल स्वरूप में लीन हो जाती है. इस अवस्था को तर्क से नहीं जाना जा सकता. इस अवस्था में कोई भी हलचल नहीं है–12/4/22. योगेश्वर अंतरिक्ष ने राजा निमि को समझाया है कि व्यक्त का अव्यक्त होना प्रलय है ;इसका विपरीत क्रम सृष्टि है और भगवान की माया है यह सब– 11/3/8-15.

प्राकृतिक प्रलय में अपनी शक्तियों को समेट कर सोए हुए भगवान को प्रलय के अंत मेंश्रुतियां जगाती हैं भगवान का प्रतिपादन करने वाले वचनों से–10/87/12-13 .

आत्यंतिक प्रलय उस को कहते हैं जब जीव माया/ प्रकृति से संबंध विच्छेद करके अपने आत्म स्वरुप में स्थित हो जाता है.आत्मा की माया से मुक्त वास्तविक स्थिति ही आत्यंतिक प्रलय कहलाती है.इस्कॉन के सिद्धांतानुसार : “ जब मनुष्य परमात्मा का अनुभव प्राप्त कर लेता है तो वह भौतिक जगत का आत्यंतिक या परम प्रलय कहलाता है.”

प्रतिदिन तिनके से लेकर ब्रह्मा तक जीव जन्म ले रहे हैं और मर रहे हैं, यही नित्य प्रलय है.

स्मरण रहे कि प्रलय भौतिक जगत का होता है, ब्रहमा द्वारा बनाए गए संसार का. भगवान के धाम नित्य हैं. यह वैकुंठ कहलाते हैं. इनका प्रलय से कोई लेना-देना नहीं. शास्वत होने के कारण ना इन का प्रारंभ है ना अंत. यहां पर प्रभु के भक्त रहते हैं और यहां जाने के बाद दोबारा संसार में जन्म नहीं होता, ऐसा कृष्ण ने गीता में बताया है–15/6. ध्यान देने की बात है कि प्राकृत प्रलय में हम नष्ट नहीं होते और ना ही हम /जीव के कर्म.संसार की फिर से रचना होने पर हम मायाबद्ध जीवो को वहीं से प्रारंभ करना पड़ता है जहां प्रलय के समय थे. जैसे क्रिकेट के खेल में दूसरे दिन उसी स्कोर/ स्थिति से खेल शुरू होता है जो खेल समाप्त होने पर था. यह जगतगुरुतम श्री कृपालु जी समझाते हैं.

वर्तमान कल्प श्वेत वाराह कल्प है.प्रत्येक कल्प में 14 मन्वंतर होते हैं. सातवांँ मन्वंतर चल रहा है. मनु का नाम वैवस्वत है और युग 28वां कलियुग है. ब्रहमाजी के 50 वर्ष पूरे हो चुके हैं. यह उनके 51वें वर्ष का पहला दिन है. पिछले युग में, द्वापर में, स्वयं भगवान कृष्ण ने अवतार लिया था करीबन 5000 वर्ष पूर्व. यूँ तो हर द्वापर में श्री कृष्ण अवतार लेते हैं, परंतु कल्प में एक बार स्वयं भगवान पधारते हैं जिन्हें अवतारी कहा जाता है.ब्रह्मवैवर्त पुराणके प्रकृति खंड 54/74 का हवाला देते हुए श्री प्रकाशानंद अपनी किताब ट्रू हिस्ट्री एंड रिलीजन ऑफ इंडिया में पेज पर 455 *लिखते हैं कि हमारे सूर्य की वर्तमान आयु 155.52 ट्रीलियन155.52 trllion वर्ष है.ब्रह्मा के हर 15 साल के पश्चात एक महा प्रलय(प्राकृत नहीं ) होता है जिसमें हमारी धरती और सूर्य का नवीनीकरण होता है . ब्रह्मा ने अपनी आयु के 50 वर्ष पूर्ण कर लिये हैं ,तीन बार ऐसा नवीनीकरण हो चुका है और इस धरती की शेष आयु 2.348 बिलियन वर्ष है.कुछ विद्वान, जैसे श्री विश्वनाथ चक्रवर्ती और श्री जीव गोस्वामी का मत है कि हर मन्वंतर के पश्चात जल प्रलय होती है. इसमें सारे प्राणी समाप्त हो जाते हैं, धरती पर जल ही जल हो जाता है. अन्य विद्वान श्रीधर स्वामी कहते हैं कि हर मनु के बदलने पर प्रलय नहीं होती. भागवत से यह बात तो स्पष्ट है कि चाक्षुष मनुके पश्चात एक जल प्रलय अवश्य हुई है. सत्यव्रत/ श्राद्ध देव,आगामी मनु,वैवस्वत मन्वंतर के,को प्रेरणा देकर भगवान/मत्स्य अवतार ने एक नाव में समस्त प्राणियों के सूक्ष्म शरीर रखवाए हैं, जिन से आगे चलकर सृष्टि चली है…1/3/15. ऐसा ही वर्णन नोआह Noah के मामले में बाइबिल में है. …Genisis 7-10.अंतर इतना सा ही है कि बाइबिल में समस्त प्राणियों के स्थूल शरीर बचाने का वर्णन है.

हर कल्प में सारी घटनाएं एक जैसी नहीं होती हैं, यह बात वशिष्ट जी को कौवा काकभुशंडिजी योग वशिष्ठ में समझाते हैं. “मैंने महाभारत के अलग-अलग अंत देखे हैं, दक्ष यज्ञ को देख देख कर तो मैं उकता गया हूं… ” उदाहरण के तौर पर देवी भागवत ,जोकि सारस्वत कल्प( स्कंध 6अध्याय 31) की है, में राजा परीक्षित का मोक्ष नहीं हुआ, सर्प दंश से दुर्गति हुई . उनके पुत्र जन्मजय द्वारा व्यास जी से देवी भागवत सुनने के पश्चात ही परम धाम मिला …(.तीसरे स्कंध का बारहवां अध्याय देवीभागवत माहातम्य अध्य.1) श्रीमद्भागवत पदम कल्प की घटनाएं बताती है,(2.10.47) जिस कल्प में परीक्षित का मोक्ष हुआ है…. 10.6.10-13. प्रकाशानंद जी का कहना है की अलग अलग मन्वंतर में घटनाओं में थोड़ा बहुत परिवर्तन आ सकता है, दर्शन और उपदेश वही रहता है, क्योंकि पुराण शाश्वत है. कभी-कभी लक्ष्मण राम के बड़े भाई भी बन सकते हैं और बलदेव कृष्ण के छोटे भाई. कभी राधा रानी कृष्ण के प्रकट होने के बाद प्रकट होती है और कभी-कभी रासलीला का स्थान थोड़ा सा परिवर्तित हो जाता है, उदाहरण के तौर पर चंद्र सरोवर,गोवर्धन में भी रास लीला हो सकती है.( ट्रू हिस्ट्री एंड रिलिजन ऑफ इंडिया-63)) .

चाहे संसार में व्यक्त रूप से रहें ,या अव्यक्त रूप से रहें, संसार में केवल भगवान ही हैं. भगवान के अलावा और कुछ नहीं है. जीव भगवान का सनातन अंश है. यूं तो भगवान सबके हृदय में हैं और सबके सुहृद है. परंतु संसार को सुचारु रुप से चलाने के लिए कुछ जीवों को विशेष अधिकार देते हैं. मनु और मनु पुत्र संसार में कानून व्यवस्था कायम रखते हैं और धर्म को रक्षा देते हैं. इनसे ही संसार की वृद्धि होती है. प्रथम मनु और शतरूपा ब्रह्मा जी के शरीर से निकले. इनसे ही प्रथम बार मैथुनी सृष्टि आरंभ हुई. प्रत्येक मन्वंतर के मनु अलग-अलग होते हैं जो पूरे मन्वंतर तक राज करते हैं.वर्तमान मनु श्राद्देव हैं जो सातवें मनु है और वैवस्वत मनु कहलाते हैं. इनके पुत्र हैं इक्ष्वाकु, नाभाग, वसु मान आदि. २८ वाँ कलि युग चल रहा है . लुप्त हुए वेदों को वापस स्थापित करने के लिए प्रत्येक मन्वंतर में पृथक- पृथक सप्तऋषि भी होते हैं.इस मन्वंतर के सप्तऋषिगण कश्यप, अत्रि ,वशिष्ठ, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और भारद्वाज है. इस सातवें मन्वंतर का इंद्र पुरंदर है और मुख्य देवता आदित्य, वसु, रुद्र, मरुद्गण, विश्वदेव आदि हैं. इंद्र आदि देवता स्वर्ग में रहते हैं और यज्ञ में दी जाने वाली आहूतियां स्वीकार करते हैं.भगवान अपने अंश से प्रत्येक मन्वंतर में अवतार लेते हैं. इस मन्वंतर में भगवान ने वामन रूप में अवतार ग्रहण किया है, ऋषि कश्यप की पत्नी अदिति के गर्भ से.

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